गुनाह करना तो मेरी आदत है,
करके कह देती हूँ मेरी शराफत है,
जब गुनाह किया तब रोका क्यूँ नही,
मै तो समझी थी कि आपकी इजाजत है।
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उससे मिलना शायद गुनाह था,
मुरशद! संकेत दिया तो होता,
आज बहुत दुख हो रहा है,
मुरशद!कम से कम बता तो दिया होता।
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ए खुदा!इच्छा है तुझसे मिलने की,
सब जनता था क्यूँ इस कदर बर्बाद कर दिया,
इस तमन्ना की उम्र मे,
मैने ऐसा भी क्या गुनाह कर दिया।
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©snehakalra
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