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" गुरु( सात्विकता ) "

जीवन होता है शुरू ..
तो टिमटिमाती मासूम निगाहों के सामने होता है गुरु !
धीमी धीमी चलती सांसो को भीतर में भरता है गुरु !
जब लड़खड़ाते हैं कदम तो हाथ पकड़ता है गुरु !
व्यक्तित्व के सांचे में अच्छाइयों को भरता है गुरु !
दूसरों की पीड़ा को देख जब दर्द महसूस होता है
तो उन भाव में रहता है गुरु!
उदासीन चेहरों में जो मुस्कुराहट का भाव भरने का आदेश करता है गुरु!
भाव की गंभीरता में जो नैनों से अश्रु छलकाता है गुरु !
मासूम निगाहों से बालपन झलकाता है गुरु!
चिड़िया को चहकाता है गुरु !
बगिया को महकाता है गुरु !
हमारे दामन निश्छलता लाने का प्रयास करता जाता है गुरु!
उलझते इस जीवन में रुक कर सोचने का भाव लाता है गुरु!
धीरे से नींद में मीठे सपने सजाता है गुरु!
अपने सहज प्रयासों से हृदय में प्रेम के बीज बौ जाता है गुरु!
हर क्षण में आता है और समझा कर जाता है गुरु
जो मासूम इरादों से भरा हो वो समझ जाता है और जो उलझन की कश्तियों में सवार हो वो धंसता चला जाता है!
ईश्वर की आहट को दिखलाता है गुरु!
मानव अपने भीतर की सात्विकता मे उपस्थित पाता है गुरु!
खोजता कहां है इस जहां में गुरु !
भीतर की सात्विकता ही है वास्तविकता में गुरु।।
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