गुरुकुल में शिक्षा लेने विद्यार्थी जाता था,
गुरु के कुल को अपना कुल बताता था,
आचार्य देवो भव प्रथम विचार ह्रदय में बिठाता था,
हर एक विद्यार्थी को भाई बताता था,
गुरु को ही मानता था पिता और गुरु पत्नी को माता कहता था,
जहां गुरु की वाणी ही कलम और शिष्य का दिमाग ही कागज होता था,
जहां सभी विद्यार्थी समान थे
गुरुकुल में गुरु ही गुरु(बड़ा) होता था,
जहां गुरु ही ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु ही महेश कहलाता था,
गुरु की आज्ञा बिना कोई गुरुकुल से बाहर ना जाता था,
गुरु के पास रहकर पूरे विश्व का ज्ञान पाता था,
36 गुण, 64 कलाएं गुरु के अंतर में भंडार था,
गुरु के लिए शिष्य और शिष्य के लिए गुरु ही तो संसार था,
सत्य कहा है कबीर जी ने
गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागे पाय
बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो मिलाय
विकास गर्ग
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