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है माधव

है माधव
है माधव,
मुझे बहुत सहारा है तेरे होने से,
पर मन में एक सवाल आता है अक्सर
खुद से ही कुछ कहने-सुनने से

मेरी किस्मत की किताब के
पन्ने इतने भारी क्यों हैं?
हर बनने के पीछे छिपी
ये दीमक सी लाचारी क्यों है?

इस किताब की जिल्द
फटी-फटी सी क्यों है?
हर मोड़ पर ये किस्मत
रुठी-रुठी सी क्यों है?

पन्नों पर लिखे अक्षर
ढूंढले-ढूंढले क्यों हैं?
क्या मेरे ही ख्वाब यहाँ
टूटे-बिखरे क्यों हैं?

और इस किताब का शीर्षक
बोझिल-सा क्यों लगता है?
हर एक लफ़्ज़ यहाँ जैसे
दिल पर बोझ-सा रखता है।

है माधव…
जब तू साथ है,
तो फिर ये कहानी
इतनी कठिन क्यों है?

क्या ये तेरी कोई लीला है,
या मेरी ही परछाई है?
इन भारी पन्नों के बीच
क्या सुकून की भी कोई जगह छुपाई है?.