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हे स्त्री...

काफी बुनियाद हे होंसले तेरे,
जो तेरे जिने की वजह बने..
सर ढकती थी तू कभी अपना पल्लू से,
अब ढका करती हो पायलट की हेल्मेट से..
घर सांभालती थी कभी हात मे चुडी और झाडू,
अब लढती हो सीमा पर बंदूक हात मे लेकर..
पार न की थी कभी दहेलीज घर की,
आसमान मे उडान भरी ऊन पैरों से ही..
तू ऐसे ही बस आगे बढ,
क्योंकी तू खुद ही हे साथ तेरे..
हे स्त्री इन होसलो को सलाम तेरे..
मधु...
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