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खुशहाल कट रही थी जिंदगी ,
मां के आंचल की छांव में ।
निकल पड़े हम तरक्की करने,
उतर कर ममता की नाव से ।।
तुम्हें कैसे बताएं मेरे भाई,
हुई थी कितनी व्यथा तुम्हारे अलगाव से ।
मन तो अब भी करता है ,
वापस आ जाएं अपने घर गांव में ।।
निकले थे घर से ,
माथा टेककर पिताजी के पांव में ।
खाई थी कसम आंच नहीं आने देंगे ,
मूंछों की ताव में ।।
प्यार तो खूब मिला ,
घर वालों से ।
पर सब कुछ छोड़ कर चल दिए ,
हम अपनी मंजिल की राहों में ।।
वरूणेन्द्र सिंह बैस
©kuchbhi