हिल सकता नहीं इक नफस मैं तेरे बिना
फंस गया हूं यार कफस में तेरे बिना।
रंग-बिरंगे तितलियाँ है प्रेम के हर शाख पर
भुख कैसे कम होगा हवस का तेरे बिना।
कई दिन गए गुजर मगर देखा न चांदनी रात
चांद को लगता मेरा आंगन इक कवस तेरे बिना।
आप आ कर कभी मन को मेरे बहलाइए
हैं ग़मों का दिल में बहुत उमस तेरे बिना।
वो परिंदा जो कभी फलक को छू आ जाता था
बैठ गया घर खामुश कई दिनों से तेरे बिना।
©Anuragrahi
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