बेटा आया, ख़ुशियाँ आईं
सोहर-माँगर छम-छम-छम
बेटी आयी, जैसे आया
कोई मातम का मौसम
मन के इस संकीर्ण भाव को, रे मानव मिट जाने दो
खिलने दो ख़ुशबू पहचानो, कलियों को मुसकाने दो
चौखट से सरहद तक नारी
फिर भी अबला हाय बेचारी?
मर्दों के इस पूर्वाग्रह मे
नारी जीत-जीत के हारी
बंद करो खाना हक़ उनका, उनका हक़ उन्हें पाने दो
खिलने दो ख़ुशबू पहचानो, कलियों को मुसकाने दो
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©vikasgarg
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