हकीकत
तू इस गलतफ़हमी में मत रह,
कि मैं यूँ ही अल्फ़ाज़ लिखता हूँ।
जो मोहब्बत सिर्फ़ रह गई मेरे हिस्से,
मैं उस मोहब्बत की आवाज़ लिखता हूँ।
काग़ज़ पर लिखे लफ़्ज़ नहीं होते,
ये इश्क़ में मिले गहरे ज़ख़्म होते हैं।
लोग समझते हैं, शौक़ है मेरा लिखना,
मैं हर मिसरे में दिल के हालात लिखता हूँ।
कोई पूछता है इस शेरों-शायरी की वज़ह तो,
मैं अक्सर मुस्करा कर टाल देता हूँ।
पर हकीकत ये है, हर अधूरे ख्वाब के बाद,
नगमें नहीं, मैं टूटे ज़ज्बात लिखता हूँ।
काश वो जाते-जाते एक बार ठहर जाती,
और पलटकर देख लेती मेरी हालत।
मैं इस बेज़ान दिल की धड़कनों के लिए,
उसकी एक झलक को मुकम्मल इलाज़ लिखता हूँ।
© विशाल सैनी
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