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हम भी थे इक शाख किसी बरगद के ।

हम भी थे इक शाख किसी बरगद के
टुटी शाख और फिर मेरा किनारा हुआ।
आज कहते है मुझे देखकर हर पेड़ पौधे
कि मैं हूं जिंदा और तू है मरा हुआ।
अगर लदी हो बोझ से बदन जिसकी
रख सके कैसे खुद को तानकर खड़ा हुआ।
बेवजह ही शोख-ए-मन में शोक आ गए
और खुल गया गांठ गम का जो था गड़ा हुआ।
या जमीं हो आस्मां दोनों जहां में नहीं मुमकिन
राह-ए-मंजिल जो न हो कांटों से भरा हुआ।
दुनिया देने लगी है अब हमें भी इज्जत
'अनुराग' जबसे छोटा से ये नाम है बड़ा हुआ।
©anuragrahi