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हम कही अपनी बसी बसाई दुनिया छोड़ आए है।

लिखा जाना था जिसमे सदारत का हिसाब,
उन मददगारों का बही-खाता छोड़ आए है।
सुबह उठते ही जिनसे अक्सर मिला करते थे ,
वो लोग,वो गाँव, वो रिश्ता-नाता छोड़ आए है।
कभी पिता जी की डांट तो कभी माँ का गुस्सा,
इतराता वो बचपन मुस्कुराता लड़कपन छोड़ आए है।
जहाँ हर उम्र के दोस्तों से घिरा रहता था मैं,
वो प्यारा सा गाँव वो पीपल का छाँव छोड़ आए है।
जब होती थी हुजूम परिवार के सदस्यों की त्योहारों में,
हर दिवार पर घर के अपना तसवीर छोड़ आए हैं।
ज़िन्दगी तूने पेट के ख़ातिर मुझे कहाँ कहाँ भटकाया,
भाई भतीजा प्यारी सी गुडीया बिलखती माँ छोड़ आए है।
जो सड़क ढाका से चैनपुर होते हुए बैरिया तक जाती है,
वहाँ मैने वर्षो का सजाया हुआ गुलिस्ताँ छोड़ आए है।
©anuragrahi