मजहब-ए-इश्क का दामन पकड़ो यारों
इश्क करने वाले दिल के बुरे नहीं होते।
खुदा का शुक्र है मुझपे कि उनके न होने पर भी
उन्की चाहत मेरे दिल से जुदा नहीं हुई ।
दिल का हालात दिल टुट जाने पे नजर आती है
जैसे हर चीज स्वादहीन बेअसर हो जाता है।
इश्क की किताब में नाम दर्ज करवाते ही
गम का नजराना पेश होना शुरू हो गया।
इबादत-ए-यार से बेहतर है इश्क-ए-हरजाई
कम से कम दो दिल कभी रुसवा नहीं होतें।
चांदनी रात में समंदर किनारे तक आ जाता है
जैसे कोई आशिक महबूब के इशारे पे आ जाता है।
©anuragrahi
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