हमने जुनूँ-ए-इश्क़ में है और इक इम्तिहाँ दी
जो हो न सके हमारा उन्हें बार-बार सदा दी।
वो नकारती रही मुझे और मनाता रहा मैं
अपने मुस्तकिल से बाहर की भी कई वादा दी।
वैसे पौधे से ही फल का अंदाजा लगाया जा सकता है
फिर क्यूं मैने जिंदगी में उसे तवज्जो ज्यादा दी।
हमें किसी चीज़ या किसी सहारे की जरूरत नहीं रहीं
क्या कम है! उसने जो गम-ए-इश्क़ की है लबादा दी।
मैं कभी भी कहीं भी नेस्तनाबूद हो सकता हूं
मेरे अंदर जो उसने इतना जहर की है भर बुरादा दी।
©anuragrahi
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