हमराह मेरे हमदम हमें आपका सहारा चाहिए
है फंसी मझधार ये कश्ती किनारा चाहिए।
यूं तो हम हुस्न की नुमाइश नहीं कभी करते
खिदमत-ए-इश्क़ में बस आपका इशारा चाहिए।
लगी हो आग जब लिल्लाह दों जवां दिल में
बुझाने के लिए अब्र-ए-उल्फत का फबारा चाहिए।
हम जानते है आप सिर्फ और सिर्फ मेरे ही हैं
पास कब्र के आपके जमीं दो गज हमारा चाहिए।
किया न इबादत खुदा की न ईल्तजा किसी का
कह रहा हूं मगर आपसे वो अदा हमें दोबारा चाहिए।
तुम्हारे सिवा नहीं अनुराग का कोई जहां में
हमनशी दिखना इस बाग को शादाब हरा-भरा चाहिए।
©anuragrahi
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