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हमसे अब तारीक-ए-शब का सफ़र तय न होगी।

हमसे अब तारीक-ए-शब का सफ़र तय न होगी
तुम बिन ऐ जानेमन इन आंखों में शय न होगी।
हम लौट चले आए हैं ये सोंच कर मयखाने से
कि तेरी निगाहों सी किसी मयकदे में मय न होगी।
कुछ तो जगह दे दो दिल में अपने मुहाजिर को
अफजाया-ए-तौफिक से ज्यादा कोई शै न होगी।
देखिए दरवाजा खटका रहा हूं फिर एक बार
आगे दस्तक दिल पर पै-ब-पै न होगी।
मेरी खिदमत के लिए आंखों में खूं संभालें रखना
यहीं जायज़ है पैमाने में अब वो मय न होगी।
अनुराग न हो तो तेरे शहर-ए-दिल में
परछाई सी कोई भी शय न होगी।
©anuragrahi