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हो   कोई   रास्ता  कोई  मोड़  जिस पर ठहर जाऊँ

हो   कोई   रास्ता  कोई  मोड़  जिस पर ठहर जाऊँ
गिरूं कानों से काँधे तक ज़ुल्फ़ बन के सँवर जाऊँ
मिरे  तरतीब  में  ये  सलीका  नही  चुपचाप मैं बैठूँ
बनु  झोकां मैं  गर्दिश का  और  फिर  गुज़र  जाऊँ
हालात-ए-वजूद  ये  है  कि  किरायेदार  दिखता हूँ
मेरा  बदन  कंहा है  कोई  बताये किसके  घर जाऊँ
पत्थरों  की  दुनिया और  इंसानी  जिस्म  से ये बुत
भर  चुकी हैं ख्वाहिशें,लौटूं फिर अपने शहर जाऊँ
मेरे  बदन को जलाना नही  शोला  बनके  तड़पुँगा
ख्वाहिश-ए-ताब है रफ़िक़ान मिट्टी में बिखर जाऊँ
मुझे  अब  बाटँ  भी  दे  मेरे   टुकड़े  करके  "अमन"
न  कर जीने के एहसान कंही मरने से भी डर जाऊँ
-अमन वर्मा"अमन"
©amnakku