होके इन बांहों से जुदा मैं कहां जाऊंगा
तेरे गजरे की फुलों में समा जाउंगा।
तेरे होठों की ये लाली
आंखें कजरे सी काली
ये जुल्फों का बिखड़ना
जैसे झरने का हो उतरना
मैं तेरे नाज़ुक बदन को
छु कर गुदगुदाऊंगा।
तेरे गजरे की फुलों में समा जाउंगा।
इन खुस्क आंखों में है इक लंबी कहानी
दबी हो जैसे सदियों पुरानी
ग़म के सेहरा का तुझसे पर्दा हटाकर
तेरी नज़रों से अपनी नजरें मिलाकर
किताब-ए-दिल का तेरे एक एक पन्नों को
मैं तेरी ही जुबां में सुना जाऊंगा
तेरे गजरे की फुलों में समा जाउंगा।
अभी तो है खुद से वाकिफ नहीं तूं
समझती हों प्यार अभी मुनासिब नहीं तूं
जवानी का साया अब ठहरने लगें हैं
शोख-ए-बदन अब थिरकने लगे हैं
अंगों के तेरे हर नई कलियों को
जादू की तरह पल भर में खिला जाऊंगा
तेरे गजरे की फुलों में समा जाउंगा।
होके इन बांहों से जुदा मैं कहां जाऊंगा
तेरे गजरे की फुलों में समा जाउंगा।
©anuragrahi
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