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होंठों से खुशी आंखों से रोशनी ले गई।

होंठों से खुशी आंखों से रोशनी ले गई
यह वक्त हम गरीब से ये क्या-क्या ले गई।
इक दश्त में छोटा सा मर्हला था अपना
उस घर को उड़ाकर एक झोंका ले गई।
मालूम है कि पैरों तले मेरे अब न है ज़मीं
एक वहशी मनचली दरिया उसे बहा ले गई।
मेरे मुट्ठी में बस सुखे हुए अब फुल ही है
खुशबुओं को उड़ाकर तो हवा ले गई।
मेरे भी थे ताल्लुकात किसी ऊंचे घराने से
वो शान-ओ-शौकत किसी की बद्दुआ ले गई।
अब इन आंखों से आंसू भी नहीं टपकते अनुराग
बड़े अदब से ये ग़म चश्म से सब सुखा लें गई।
©anuragrahi