होठों की हंसी चेहरे की खुशी से क्या ब्यां होता है
दिल ही में दबा देता है जो दिल को फ़ुग़ां होता है
जफ़ा जोर ज़ुल्म सहने की आदत लग गई है मुझे
सुकून वहीं मिलता है जहां ग़मों का कारवां होता है
तुम ग़ुलाब भेज कर क्या जताना चाहते हो
क्या गंध-ए-गुल से अंजान बाग़बां होता है
तुम्हें शायद वादें तोड़ने पर फर्क नहीं पड़ता होगा
मेरे शहर में रोजी-रोटी सब कुछ ज़ुबां होता है
लाख छुपाओ आज़ न कल सच्चाई बाहर आनी है
चिराग के वश में कहां कभी धुआं होता है।
©anuragrahi
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