I

हर बार माँ...

हर बार माँ...
एक स्त्री हमेशा माँ बनती है, कभी अपने भाइयों के लिए माँ बनती है, कभी अपने पिता के लिए माँ बनती है। कभी अपने पति के लिए माँ बनती है, कभी सास-ससुर के लिए माँ बनती है।

अपने बच्चों के लिए माँ बनने से पहले ही, वो न जाने कितनी बार माँ बन चुकी होती है… हर रिश्ते में, हर मोड़ पर, बस माँ ही होती है।

और एक पुरुष… उसे हर बार माँ ही चाहिए होती है, कभी बहन में माँ, कभी बेटी में माँ, कभी पत्नी में भी वो माँ ही ढूँढता है।

उसे हर कदम पर माँ का सहारा चाहिए, हर दर्द में माँ का आँचल चाहिए। पर वो भूल जाता है एक सच्चाई— जिसका हाथ पकड़ कर वो घर लाया है, वो भी किसी की बेटी थी, जिसे माँ का आँचल एक बार छूट जाए… तो फिर दोबारा माँ नहीं मिलती।

असल में हाथ तो उसने थामा होता है, पर उस हाथ को थामकर चलती हमेशा स्त्री ही है। हर बार माँ बनकर उसे संभालती है, हर बार माँ बनकर उसे जीना सिखाती है।

वो इतनी सशक्त है कि सब कुछ सह जाती है, फिर भी बेटे, भाई, पति के लिए व्रत रखती है। हर रूप में माँ बनकर प्यार निभाती है, पर क्या किसी पुरुष ने कभी एक भी व्रत किया है?

स्त्री इतनी सशक्त है… कि किसी ने उसके लिए एक भी व्रत नहीं किया, फिर भी वो सबसे ज्यादा जीती है, हर दर्द के बाद भी मुस्कुराती है।

कितना अजीब है ये संसार… पुरुष को जीने के लिए हर बार माँ चाहिए, और स्त्री… हर बार माँ बनकर भी, कभी माँ को दोबारा नहीं पाती।

#Ink&Emotions ✍️