हर दिन तेरी राह-ए-इंतजार में गुजर जाती है
हर रात तेरी ख्याल-ए-इजहार में गुजर जाती है।
उस दिन हमें चैन-ओ-निंद कहां आता जो
दिन तुम्हें देखे बिना बेकार में गुजर जाती है।
किसी शक्ल में भी आए जमीं पे रौशन-ए-चांद
चांदनी तो हर दिल-ओ-दयार में गुजर जाती है।
तुम यूँ न आंखें गड़ा कर किसी और को देखा करो
ये शमशीर दिल में आर पार गुजर जाती है।
ये हद है कि इतने जख्मों को लिए कैसे जिंदा हूं
मौत तो करिब आती है मगर बार बार गुजर जाती है।
हमने तो अभी तक किसी का न बुरा चाहा अनुराग
फिर क्यूं मुझपे हंस कर संसार गुजर जाती है।
©anuragrahi
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