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हर दरो दीवार सवाली नजर आते हैं !

हर दरो दीवार सवाली नजर आते हैं !
बिन तेरे यह घर तो क्या शहर खाली नजर आते हैं,
हसरतों की भीड़ में तुम तारा बनकर चमकते थे कभी ,
चमकते हुए इस शहर में हर दिल काले नजर आते हैं ।
तुम्हारी खुशबू हर फूल में महकती थी कभी,
गुलशन में हर कली पर अब विरानी नजर आती है ।
तन्हाई किस कदर दुश्वार थी हमको कभी ;
घर के आंगन के हर कोने अब खामोश नजर आते हैं ।
पाक दामन को हम बचा लेते तो अच्छा
होता ,
अपनी नजरों में हम खुद ही अब दागदार नजर आते हैं
उदास राहों पे तेरे निशान को ढूंढते हैं अब हम ,
किसी मोड़ पर आंचल से तेरे नैन झांकते नजर आते हैं।
शुक्रिया अदा भी ना कर सके तेरी वफाओं का ,
रुसवाइयों के डर से हर दिल अब बेवफा नजर आते हैं
तेरी मुस्कान थी केवल मेरे जीने का सबब ,
हर शख्स के चेहरे अब मुझ पर हंसते नजर आते हैं ।।
पारखी

डाॅ लता शर्मा
©parkhi