हर जख्मों का मर्कज़ बना जा रहा हूं
खुद के दुश्मन को मैं पाला जा रहा हूं।
उनके यादों के चिलमन सामने आंखों के लगाकर
सर-ब-सर उन्ही को हर रोज देखा जा रहा हूं।
मैं कतरा हूं लेकिन समुद्र की गोद में
शुरू से अंत तक बहा जा रहा हूं।
वहीं हुस्न जिसके है ये सब मजा़हिर
उसी हुस्न से पिघलता जा रहा हूं।
साथ मेरे वो अब कभी कहीं नहीं आते
फिर भी मुहब्बत के हाथों लुटा जा रहा हूं।
न रूप न मतलब, न सामने न छिपा हुआ अनुराग!
किस गम में मैं गुम हुआ जा रहा हूं।
©anuragrahi
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