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हर पल खिलती प्राकृति

इस अनभिग्य जगत मे
मै ने एक शाम बिताई
विश्व सुन्दरी जैसी घटा सी छाई है
शान्त मन उदन्त बदल
मनोरम दृश्य बनाया है
शीतल जल शान्त हवा
मौसम मे निर्मलता छाई है
यह दृश्य मनोरम देख कर
मोर निकल कर नाच रहे हैं
सिंह जगत मे धहाड़ रहे
देख मनोरम दृश्य अनोखा
ह्रदय प्रफुल्लित हो रहा है
लग रहा है आज जैसे
रोक लू यह दृश्य यही पर
तितलियों के संग खेलू
बदलो के संग दौड़
उड़ रहे है आज जैसे
मै भी उनकी उड़ान पा लूँ
मन में बसा यह दृश्य
मुझको मंत्र बिमुख कर्ता है
जिसकी कोमलता को
अपने भीतर भर लू
और डूब जाऊ मै इसी मे
©nihalnat