हर राहों पर मेरे वो रहबर याद आते हैं
भुलाता लाख हूं मगर बराबर याद आते हैं।
ये तन्हाई तो बस मौसम है यादों का
जो जितना दुर है ज्यादा अक्सर याद आते हैं।
वो कोई बंधी गठरी नहीं कि छोड़ आऊं
साथ गुजारने का मिले अवसर याद आते हैं।
मेरे नफस नफस कदम कदम पे है वो
मोहिनी सी उनकी सुरत खासकर याद आते हैं।
न छेड़ मुझसे मयकदों की बेखुदी के अफसाने
ढुंढते हूए वहां आना उनका चलकर याद आते हैं।
हकिकत खुल गई अनुराग तेरे गम-ऎ-मुहब्बत की
तुझे तो वो अब पहले से बढ़कर याद आते हैं।
©anuragrahi
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