हर वक्त कोने की खाक छानी मैंने,
हर वक्त बंधी गठरी खोल उड़ा दी मैने।
हमने क्या कमाया क्या नहीं गंवाया,
जिवन के एक एक पर्ची का हिसाब भुला दी मैने।
है उन्माद मुझमें या उन्मादी मैं हुं,
जो अपने मासुमों की खुशी का चढा दी बली मैंने।
अब किसी दरक के आने की अनहोनी सी लग रही,
अपने ही हाथों से बुनियाद जो हिला दी मैने।
कुछ और दिन गर चल फिर सकूं खुदा की खैर हो,
वैसे तो हर मरज की दवा आजमा ली मैनें।
क्या दोजक में भी मेरा कोई रफिक होगा,
यहां तो सभी दोस्तों से साथ छुड़ा ली मैनें।
©anuragrahi
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