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" ह्रदयास्थिति "

धीरे-धीरे कुछ अनजान हो रहा हूं
बाहरी मुस्कुराहट में बेजान हो रहा हूं
संसार के समंदर से किनार हो रहा हूं
अनसुलझे बयानों का पैगाम हो रहा हूं
भीतर का पर्यटक और रहमान हो रहा हूं
स्वयं की तलाश का फरमान हो रहा हूं
कभी प्रकृति की छांव में ,
कभी अंतरमन के दरमियान मे,
मैं मुसाफिरों की भांति बेलगाम हो रहा हूं
ईश्वर के गुणों में डूबता, अंधकार में चांद हो रहा हूं
कभी भीड़ में झूमता ,
कभी एकांत में घूमता,
मैं एक उड़ते हुए परिंदे के समान हो रहा हूं
इस सफर में ईश्वर का अहसास का पाकर,
मैं एकांत में उनकी गोद में सोए शिशु के समान हो रहा हूं
और कृतज्ञता से पूरित दरमियान हो रहा हूं।।
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