कहां से लाऊं वो हर्फ जिसमें सब कुछ समा जाए,
अपने आप ही सब कुछ कह जाए
मेरे अंदर के कौतूहल को शब्दों में बयान कर जाए,
नहीं है अब ना कोई हर्फ ना अल्फ़ाज़ ना कोई बात,
भीतर उमड़ा तो जरुर है एक सैलाब,
जिसमें है जाने कितने सवाल और जवाब,
पर बात सारी ख़तम हो जाती है वहीं ना
कि सुनाना क्या है?
अपना हाल ए दिल बताना क्या है?
अब भला कुछ भी बता के समझाना क्या है?
©anvisha
A