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हथेली पर क्यूं लोग जान लिया फिरते हैं।

हथेली पर क्यूं लोग जान लिया फिरते हैं
सस्ती नहीं इतनी जिंदगी जो जान लिया फिरते हैं।
हमने मांगा था रब से महबूब की जिंदगी बदले अपने
मगर कम पड़ गई शायद और लोग जान लिया फिरते हैं।
आदमी हो आदमी का हो सके जितना भला करो
हम तो बस इसी दुआओं का पैग़ाम लिया फिरते हैं।
अब कहां ढुंढू नहीं मिलती उनकी सुरत किसी से
इस जहां में हम उनकी तस्वीर लिया फिरते हैं।
जो मर रहा है भला उसकी किस से अदावत होगी
आप बेवजह ऐसे क्यूं शमशीर लिया फिरते हैं।
अपने गुनाहों में अब हमें कोई न शामिल करें
अनुराग तो हाथों में अपने अब तकदीर लिया फिरते हैं।
©anuragrahi