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हुस्न और इश्क

वो दूर ले ग्ई मुझे मेरे ठिकाने से
जिसकी तलाश में था मैं जमाने से
साथ खुशियों के गम का काफिला चलता रहा
मोहलत न मिली मुझे खुद को कभी हंसाने की
तू संवरती ग्ई मैं बिखरता गया राहे उलफत में
दस्तूर दुनियां का निभाता रहा अपने अफसाने से
दिल की इतनी तमन्ना ऐ शमा तू रौशन रहे
चाहे मैं जलता रहूँ तेरे साथ यूँ हीं परवाने से
तूने आज तलक न सुना मेरे दिल का हाल
मुझे आजतक फुर्सत न मिली तुझे मनाने से
तेरी दुनियां तेरी महफिल यूं हीं रहे आबाद
मुझे तडपना पडे चाहे तेरे संग रह बेगाने से
शमा के साथ जलना पडता हीं है परवाने को
ये हकीकत तो झलकती है हर एक दीवाने से
खुदा का नूर गर है तू मैं भी निरा पत्थर नहीं
तु मुझमें और मैं तुझमें समाते आया हूं जमाने से
हुश्न और इश्क का ये खेल कितना निराला है
लहरें उतरती चढती रहती हैं अपने निशाने से
(आप स्वतंत्र हैं इस गजल पर टिप्पणी करने के लिए..)
you may read it and give your opinion..
©abhidilse