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हुस्न ए आलम

तेरी मासूमियत पे हम अपनी जान भी लुटा सकते हैं,
बंद दहलीज़ों पे हम अपना सर भी झुका सकते हैं ।
यूं इस कदर खुले हुए हुस्न ,ए बदन को देख हम तुझसे दूर भी जा सकते हैं ।
हमारा जमीर हमें गंवार नहीं करता, ओरो की तरह
ढका रहे अगर हुसने बदन तेरा तो ,हम तुझे ताज भी पहना सकते हैं।
हमनवा हमारी हो गई अगर तो कोई बला तुम्हे छु ना पाएगी ।,
इसके लिए हम अपना सर भी कटा सकते हैं ,
तेरी मासूमियत पे हम अपनी जान भी लुटा सकते है ।
©sandeepgup