तुम मुझ को फिर से जीना क्यों सिखाना चाहती हो
जो टूट कर बिखरी पड़ी है जिंदगी उसको समेटना
क्यों चाहती हो
क्यों किसी को फिर से प्यार करना सिखाना चाहती हो
क्यों किसी के ज़ख्मो पर मरहम लगाना चाहती हो
दिल का दर्द नही है ये कुछ यादे है जहन जिंदा
क्यों यादास्त को मिटाना चाहती हो
कोन हु में तुम्हारे लिए कोई खुदा तो नही
फिर क्यों मुझे अपना खुदा बनाना चाहती हो
©deepakshar
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