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इजाफा-ए-दर्द-ए-दिल मुक्तसर किया जाए कैसे।

इजाफा-ए-दर्द-ए-दिल मुक्तसर किया जाए कैसे
दयार-ए-यार में तो सख्त पहरा है मिलने जाए कैसे।
ये महरूमीयां मेरी मजबूरीयां संग बेचैनीयां है जो
बस दिल ये तेरा ही सुनता है मनाया जाए कैसे।
मेरे चेहरे से तो ग़म का नज़राना हटता ही नहीं
हम तेरे मुताबिक अब नज़र आ जाए कैसे।

तमन्ना-ए-दिल तो मुद्दतों से थी तुझे सजाने की
तय तो पहले ये हो कि तुझे पा जाए कैसे।
मुफलिसी किस्मत का लिखा भी बदल देता है
ख़ुशी में पलने वाली ये आंसू तुम्हें आ जाए कैसे।
गुनाह तुझसे जुदा होने वालों का नहीं है अनुराग
एक कतरे को समंदर नज़र आ जाए कैसे।
©anuragrahi