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इक इंसां दगा के सिवा और क्या देगा।

इक इंसां दगा के सिवा और क्या देगा
रहम-ओ-करम तो बस वहीं खुदा देगा।
वहीं कातिल वहीं आज़ मेरा मुर्शीद है
क्या मेरे हक़ में कोई हौसला देगा।
जब भी देखोगे तुम मेरे जिंदगी को करीब से
हर एक लम्हा शायद तुझे रूला देगा।
हमसे पुछों न कभी मेरे हिज़्र का सिला
मुहब्बत के इमारत को हिला देगा।
हमने भी संयोए थे ज़ेहन में सपने कई
क्या पता था इस कदर कोई मिट्टी में मिला देगा।
ग़म का ये जहर अब पि लिया है अनुराग
मसिहा भी क्या कोई हमें दवा देगा।
©anuragrahi