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इक जाम लबों से पिला दिजिए।

इक जाम लबों से पिला दिजिए
मुझे देख कर ज़रा मुस्कुरा दिजिए।
मयकशी में नहीं नशा जो इन आंखों में है
है जो ज़हर सब मुझमें उतार दिजिए।
आज़ की रात मैं आगोश में हूं आपके
जिंदगी आज़ ही की रात उधार दिजिए।
तमन्ना है कि बांहों में लिपटा रहूं हरदम
जिने का हक नाचीज़ को बेशुमार दिजिए।
गैरत न है ये और न कोई हैरत की बात है
नज़रें मिलाकर चैन दिल को सरकार दिजिए।
लगता है कि हद से अब गुज़र जाउंगा मैं
जि चाहें अनुराग को सज़ा सौ बार दिजिए।
©anuragrahi