इन आंखों के सामने कभी कई नजराना था
तालुकात में मेरे जब उंची ऊंची घराना था।
वो बज्म-ओ-महफिल वो कबाब-ओ-शराब
हर कोठे से होकर मयकदों में आना जाना था।
न थी दोस्तों की कमी न पैसों की किल्लत
साथ अक्सर मेरे जब कुबेर का खजाना था।
याद कर कर के ये दिल पागल हुआ जाता है
एक आज का दिन है एक वो भी जमाना था।
अपने हालात का जिक्र करना कबुल-ऎ-गुनाह है
बदनशिबी जो छुटा संग बिबि का संबंध दोस्ताना था।
आज इमारतें खड़ी करने डिंगे हाकने में भी मजा नहीं
इसी दिन तक ही शायद अनुराग तेरा आशियाना था।
©anuragrahi
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