इन्तहा हो गई
एक तेरे दर्द देने की इंतहा सी हो गई,
एक मेरी खामोश सहने की आदत सी हो गई…
तू दूर जाने में हर पल बेचैन सा रहा,
और मेरी हर दुआ बस तेरे पास आने की हो गई…
तुझे आदत थी दिल तोड़ कर मुस्कुरा देने की,
और मेरी फ़ितरत ही उसे जोड़ कर खुद बिखर जाने की हो गई…
तू भागता रहा ज़िंदगी भर किसी और की तलाश में,
और मैं… एक ही जगह तेरी राह तकते-तकते रह गई…
तू तन्हा होकर भी कभी मेरा हो ना सका,
और मैं भीड़ में होकर भी सिर्फ तेरी ही हो गई…
तुझे फ़ुर्सत ना मिली कभी मेरी मोहब्बत के लिए,
और मेरी हर सांस बस तेरे नाम की हो गई…
तेरे लिए होंगे हज़ारों किरदार, हज़ारों कहानियां,
मेरी हर दास्तां… बस तेरी कमी की निशानी हो गई…
Ink&Emotions
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