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इंतजार किस का ये दिल हर रोज़ करता है।

इंतजार किस का ये दिल हर रोज़ करता है
ख्वाबों में ही अब मेरे दिन-रात गुजरता है।
कोई इस राह से होकर जाता क्यों नहीं
यहां कोई तो आदमखोर नहीं रहता है।
गुल-ए-गुलाब से हुआ है मेरे सहर का आगाज़
देखिए अब शाम किस तरह ढलता है।
खौफ इतना बढ़ गया मेरा जहां में कि
चांद भी सोंच समझकर निकलता है।
दिल में रबाब की धून की हलचल ही नहीं
फिर सिने में यहां क्या सांय सांय करता है।
है जमाने को गर अदब से जिना मंज़ूर अनुराग
फिर क्यों हर वक्त इंशा ताने शमशीर चलता है।
©anuragrahi