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इस बेजान कश्ती को तिनके का सहारा मिले ।

इस बेजान कश्ती को तिनके का सहारा मिले
निकल पाए समंदर-ए-गम से ठोस किनारा मिले।
अंदाज-ए-तगाफुल देखा है मैंने दुनिया के
कोई न हो बर्बाद और कमबख्त मोहलत दुबारा मिले।
मेरे महफिल में भी आए रौशन-ए-चांद चांदनी
तन्हाई में तहजीबन आंखों को खुबसुरत नज़ारा मिले।
हर गश्त पर टिकी है अब हमारी जिंदगी
जैसे हर रोज तेरे रूह से जाकर रूह हमारा मिले।
इन आंखों को देखना ख्वाबों के सिवा कुछ नहीं आता
सपनों में कभी तुम तो कभी चमकता सितारा मिले।
शबनम की तरह आजकल है अनुराग रिश्ता-ए-दोस्ती
गर्दिश में तुझे देख गले कौन अब तुम्हारा मिले।
©anuragrahi