इस जमीं पर मेरा भी एक आशियाना था
बचपन गुजरा हुआ मासूम जमाना था।
पुआलो का बिस्तर पुआलो का तकिया-ओ-रजाई
पुआलो के छत के साये में सर को छुपाना था।
अंगुली पकड़ छोड़ आती पाठशाला तक दादी
लौट कर घर आने का हर रोज़ नया बहाना था।
दोस्तों से किए कुछ ऐसे थे वादें जिन्हें हर हाल में
रखकर मकतल पर सर उसको निभाना था।
न पैसो की फिक्र थी न समय की पाबंदी
ये कैसा वक्त है वो कैसा जमाना था।
©anuragrahi
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