इस पत्थर के शहर में शिशे का घर है मेरा
जहां चलते हैं इट पत्थर वहां सर है मेरा।
बचना नहीं मुमकिन इल्जामातों के घेरों से
गुनहगारों के दरम्यां ही अब बसर है मेरा।
होती है सुबह मेरी शुरुआत नए हादसों से
बेइल्जाम न कोई शाम गुजरी न दोपहर है मेरा।
कैसे लाउंगा मैं बना कर उसे हीअपनी दुल्हन
इस मुहल्ले के लड़कियों पर भी नजर है मेरा।
वैसे तो बहुत पुछ बहुत इज्जत है यहां मेरी
लेकिन हसिनें ही जानती है करना क़दर मेरा।
आज फिर घिर गया अनुराग जुल्फों के घेरों में
देखना है अब होता है क्या हशर मेरा।
©anuragrahi
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