इस शहर तक रूतबा है मेरे हमदम मेरे यार की
हर निगाहों से छलकता है खुशी सजदे में प्यार की।
लुटते है निगाहों से ही देखने वाले खुब मजे
उनकी जोबन जो बन गई है महंगी मिठाई बाजार की।
यह दिल उनके चाहत में है मंजूर खाकसार ए जिंदगी
अब और न बढाओ फासला ओ घड़ी इंतजार की।
जिंदगी मुमकिन नहीं अब इस आशिक बिमार की
छिद दी है बरछियां जिगर में निगाहें यार की।
खुदा का शुक्र है मिली है जन्नत मगर मरने के बाद
दोस्तों ने दफनाया मुझे आखिर गली में यार की।
हाल ए अनुराग की देख बोला बुरी है दोस्ती
ऐसी रूसवाई ऐसा रिंद ये जिंदगी गमख्वार की।
©anuragrahi
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