इश्क़
करो इश्क़ इतना कि रूह तक उतर जाए,
होंठों से होंठ मिले कि पूरा शरीर बिखर जाए।
पहले नज़रों से चुराकर, नज़रें मिलाने की सज़ा तय हो,
फिर नज़दीकियाँ बढ़ाकर, दूर जाने की सज़ा तय की जाए।
चांदनी रात हो और चाँद सी हमसफर साथ हो,
उसे ना छुने का वादा करूँ, पर दिल फिर भी मुकर जाए।
आशिकों के इस तरह वादों से मुकर जाने की सज़ा तय हो,
फिर महबूबा को इश्क़ में, बहकाने की सज़ा तय की जाए।
आधी रात को यूँ ख्वाहिशें जगाने की सज़ा तय हो,
मगर बिना छुए भी दिलको, जलाने की सज़ा तय की जाए।
मैं मोहब्बत की आग बनकर उसकी रगों में उतर जाऊँ,
फिर अदालत-ए-इश्क़ में मुझे मेरे जुर्म की सज़ा दी जाए।
© विशाल सैनी