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इश्क की दहलीज है ये किसी गुनाह का दरवाजा नहीं।

इश्क की दहलीज है ये किसी गुनाह का दरवाजा नहीं
करते हैं मुहब्बत दिल से हमें अदावत का तकाजा नहीं।
महफूज रहो हमसे मेरे जां के सौदागरों
गर खुल जाएं तो मुड़ कर हम देखते खामियाजा नहीं।
तुने नफरत फैलाकर है बेहिसाब जो दौलत कमाई
क़ब्र में तू भी होगा फकत मेरा जनाजा नहीं।
आज बारूद के ढेर का खौंफ दिखा न हमें
तेरे हर मसाइल का जबाव है तुझे अंदाज़ा नहीं।
मेरी ख्वाहिश दो मजहब मिले दो दिल मिले मुझे हुर मिले
मखमली सेज पर भी बिन तकिया के सोने में मजा नहीं।
गुनाहगार हूं गर तो कत्ल के बदले इक डोरी से बांध दो
गुलाम-ए-जोड़ू से बढ़कर अनुराग का कोई सजा नहीं।
©anuragrahi