इश्क में अब इश्क की मुहब्बत नहीं रहीं
पहले जैसा पास मेरे अब दौलत नहीं रहीं ।
बज्म-ओ-महफिल में रात दिन शिरकत करते रहना
मुआफिक अमिरों की मुझमें आदत नहीं रहीं ।
कौन सजाएँ अंजुम कौन बनाए आशियाना
मेरे नसीब में दो गज जमीं पर हुकूमत नहीं रहीं ।
टुट सी गई है अपनों से अहद-ए-वाबस्तगी
वाबस्ता जोड़ सकुं मैं फिर से मोहलत नहीं रहीं।
क्या, है कोई जो कह दे उस फरिश्ते-ए-मौत से
ले चलो अब इस जहां से मुझमें वो ताकत नहीं रहीं ।
खुदा जाने मौत कहाँ मर गयी अनुराग
अब मुझको जिन्दगी की जरूरत नहीं रहीं।
©anuragrahi
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