मजहब की अदालत में इश्क का एक ओर नया मुकदमा आया था।
कि वो बचाने अपने इश्क को मस्जिदों में सजदे करके आई थी, और वो अपने इश्क की आस में मंदिरों में धागे बांधकर आया था।
फैसला जुदाई का दोनों को पता था, पर उनके इश्क मुकम्मल की जागीर का हक़ मजहब को ना देना था।
इश्क उनका इतना सच्चा था जो राधा कृष्ण के नाम से मंदिरों की आरती में गूंजा करता था और इश्क़- ए- खुदा बनकर अज़ान में दिया जाता था।
की आज मंज़रे - ए - बेवफ़ाई देखी जाएगी, इश्क़ को कमजोर कर मजब के नाम पर सियासत - ए - नफरत खेली जाएगी।
की नादान बड़े , इश्क़ से अनजान वो मज़हबी
क्या इश्क़ समझेगे।
©rishab
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