इश्क से अंजान कलम।
मै बार बार इसे यही बात बताता हूँ
बैठा कर इसे यही समझाता हूँ
लिखने को कहता हूँ
रंगीन दुनिया से भरे सपनों के बारे में
पता नही क्यूं इसे घमासान नजर आता है।
ये रुकती भी नही मेरे रोके
बस चलती रहती है देश की राह
मै इसे फूलों के किस्से बतलाता हूँ
इसका रुख जलियांवाला बाग को होता है
मेरी हर बात काट देना
इसकी फित्तरत है अब
मै इसे दिल्ली इश्क सिखने भेजता हूँ
ये है के इंकलाब का पाठ सिख के आती है।
पसंद नही हैं इसको लैला ओर मजनू
इसके लिए तो अस्फाक ही एक आशिक है
मै कहता हूँ के तू कुछ तो सिख इन पागल दिवानो से
झरनों से, झीलों से जो बहती हैं कल कल
पर ये है के बस देश देश ही गाती है
मै चाहता तो हूँ के ये प्यार करे हर पहर
इसकी सुंई तो बस प्रहार पर आ टिकती है
मुझे भी इसने खुद जैसा ही कर दिया है
प्यार भरे लम्हें पीछे छुट गये हैं कहीं
अब और ही सपने है इन आंखों में
हंसी से भरे ,आजादी से सने
ओर अब डर भी नही है किसी बात का
खुल के जी लेनी है अब जिंदगी
अब हर कदम मेरे साथ है,
मेरी कलम !
सचिन
©shaakh
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