इतनी थक गई हूँ मैं
कि अब आराम का ख़याल भी मौत की गोद में जाकर ही आता है।मेरी रूह भटकी हुई हवा सी है —जिसे शायद इस दुनिया की सरहदों के पार ही सुकून मिलेगा।
सीने में दर्द यूँ धड़कता हैजैसे हर धड़कन कोई कैद तोड़ना चाहती हो,जैसे दिल पसलियों से टकराकरआज़ादी की भीख माँग रहा हो।
आँखों में ठहरी हुई बारिश है,कोई बस हाल पूछ ले ज़रा सा,और सारे बाँध टूट जाते हैं —दर्द का समंदर रास्ता ढूँढ लेता है।
मेरी हँसी अब हँसी नहीं रही,वो चीख है जो होंठों पर मुस्कान बनकर ठहर गई है।
मैं अब हर ख़याल से पहले डरती हूँ,हर फैसले से पहले खुद को हज़ार बार परखती हूँ,जैसे ज़िंदगी नहीं,किसी नाज़ुक काँच पर चल रही हूँ।
मैं टूट चुकी हूँ —बिखरकर भी खड़ी हूँ,अपनों की भीड़ में एक खामोश खंडहर की तरह।
चेहरे पर सजाई हुई झूठी रोशनी,और आँखों में डूबता हुआ आसमान लिए,मैं खड़ी हूँ…अपनी ही ख़ामोशी के आख़िरी किनारे पर।
अपने आख़िरी अंत का इंतजार करते हुए।
शिवन्या
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