इज़ाज़त दो मुझे कि अब....
यादों को तुम्हारी भूलने का वक़्त है
मुख़ातिब हो तुम नए रिश्तों से ,
ये तुम्हारी ज़िन्दगी का नया हँसी सफ़र है..
पता नहीं, ये ज़िन्दगी मुझे अब कहाँ ले जाएगी
शिकायत अब मैं क्या करूँ, बात तो वहीँ रह जायेगी
तुम मुझमें शामिल रहो इस बात की इल्तिज़ा करना
अमल रहो इस फ़ैसले पर ,ये ख़ता रोज़ तुम करना
मैं भूलना चाहती हूँ... तुम्हें मगर भूल जाऊं कैसे
इन गहरे दर्द और ज़ख़्मों को छुपाऊँ अब मैं कैसे
दर्दे -ए -मोहोब्बत में इन्तिकाम कुछ इस तरह होगा...
मंज़िलो पर आकर अंज़ाम कुछ इस तरह होगा..
मैं हूँ.....
तुम्हारें साथ इस बात का यकींन ज़रूर रखना...
मग़र मुलाक़ातें -मुसलसल न हो अब
इस बात की दुआ भी अब रोज़ तुम करना ...
कनुप्रिया
©kpriya
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