S

जान-ए-जान

फकत तेरे अरमानों को ही हमसफ़र माना है,
वगरना जिगर में कोई अपनी ख्वाइश न थी।
तेरा साया ही जो एक उम्मीद है मेरे लिए,
रहमत-ए-दिल के लिए ये उम्मीद ही काफी थी।
©anuragrahi